शिव चालीसा संपूर्ण हिंदी लिरिक्स PDF | Shiv Chalisa Hindi Lyrics PDF Download

PDF Nameशिव चालीसा हिंदी PDF Download | Shiv Chalisa Hindi Lyrics
No. Of Pages13
PDF Size0.46 MB
PDF LanguageHindi
CatagoryReligion & Spirituality
SourceAgragami.in
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शिव चालीसा क्या है | What is Shiv Chalisa in Hindi PDF

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके साथ शिव चालीसा का संपूर्ण हिंदी पाठ पीडीएफ / Full Shiv Chalisa Hindi Lyrics PDF शेयर करने वाले हैं। लेकिन उससे पहले शिव चालीसा के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें आपको जरूर जानना चाहिए।

शिव चालीसा महादेव शिव शंभू को समर्पित एक अत्याधिक लाभकारी एवं अलौकिक साधना बानी है, जिसका नियमित रूप से पाठ और जप करने से कहीं तरह के पार्थिव एवं आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।

भगवान शिव महादेव हमारे सर्व शक्तिशाली “त्रिदेव” में से एक है, जिसको समग्र देवकूल का आदि या प्राचीन देव भी माना जाता है। जैसे ऋषि ब्रह्मदेव को समग्र सृष्टि का रचनाकार, भगवान विष्णु को सृष्टि का पालन करता माना जाता है, वैसे ही महादेव को सृष्टि का संघार करता माना जाता है।

शिव चालीसा हिंदी लिरिक्स Shiv Chalisa Hindi PDF
शिव चालीसा हिंदी लिरिक्स – Shiv Chalisa Hindi PDF

अगर आपके जीवन में वैवाहिक चीजों से लेकर कोई समस्या या परेशानी आ रही है, तो आपको जरूर नियमित रूप से महा शक्तिशाली शिव चालीसा का पाठ करना चाहिए। क्योंकि इसके नियमित पाठ करने से, वैवाहिक जीवन को लेकर उत्पन्न हुआ हर तरह के समस्या का अवश्य समाधान हो जाता है।

जो लोग शिव चालीसा का पाठ प्रतिदिन कर सकते हैं वह अवश्य रूप से करें, अन्यथा अगर कोई प्रतिदिन समय ना निकाल पाए तो, वह इसका पाठ हर सोमवार को जरूर करें। शिव चालीसा का नियमित पाठ करने के अलावा वह सोलह सोमवार के व्रत भी जरूर रखने को कोशिश करें, यह भी बहुत लाभदाई साबित होता है।

शिव चालीसा संपूर्ण हिंदी पाठ | Shiv chalisa Full Hindi Lyrics PDF

शिव चालीसा की शुरुआत में इसकी दोहा को पाठ किया जाता है, जो निम्न रूप है:

।। दोहा ।।
श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

मूलार्थ: गिरिया पुत्र हे श्री गणेश भगवान आपका जय हो। हे मंगलमय, आप विद्वता दाता हो। अयोध्यादास की प्रार्थना है आप अभय वरदान करो।

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दोहा के बाद पाठ किया जाता है शिव चालीसा के चौपाई, जिसका रूप होता है इस तरह:

|| शिव चालीसा चौपाई ||

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

मूलार्थ: हे गिरिजापति दिन दरिद्र के ऊपर दया करने वाले, संतानों का सदा प्रति पालन करने वाले, आपका जय हो l आपके मस्तक पर चंद्रदेव, कानों में कुंडल और नागफनी शोभाबान है।

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥

मूलार्थ: आपके मस्तक से गंगा माता बहती है, और आपके गले पर मुंडमाला शोभा देता है। बाघ खाल आपका शोभा और बढ़ाता है। आपकी छवि नाग को मोह में डालते हैं।

मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

मूलार्थ: मैनावंती की कन्या माता पार्वती आपके बाएं स्थान पर विराजमान है। हाथों में आपके त्रिशूल मंगलमय है। जिसके द्वारा आप शत्रुओं का संहार करते हैं।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

मूलार्थ: आप के निकट नंदी और गणेश जी जैसे सागर में खिले कमल की तरह है। कार्तिक जी के सहित बाकीओ की उपस्थिति का दृश्य वर्णना के अतीत है।

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

मूलार्थ: देवता गन जब जब आपको पुकारा है, तभी आपने उनके दुख निवारण किया है। देवताओं को जब तारक राक्षस ने सताया, तब सब आपके शरण में आए।

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

मूलार्थ: अपने तारकासुर के संगहार हेतु षडानन, यानी कार्तिक जी को भेजा। अपने अपने ही जालंधर असुर का खात्मा किया। आपके कल्याणमाय रूप से सारा जगत परिचित है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥

मूलार्थ: शिव शंकर आपने ही साथ युद्ध करके उसका संघार किया, आपकी कृपा अपार है। भगीरथ की तपस्या का सफलता आपके सहायता से ही पूरा हुआ।

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

मूलार्थ: अप के समान दानवीर और कोई नहीं है। सेवक सर्वदा आपका आराधना करता है। हे प्रभु आपका महिमा अपरंपार है, वेद पुराण भी आपका महिमा वर्णन करने में असमर्थ है।

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

मूलार्थ: सागर मंथन में जॉब विष का भंडार बाहर आया तो देवता और असुर सब भयभीत हो गए, तब आपने विश्व को कंठ में धारण करके नीलकंठ नाम प्राप्त किया।

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

मूलार्थ: महादेव आपकी पूजा करके ही रामचंद्र जी लंका को जीत पाए और उसे विभीषण को सौंपने में सफल हुए। बल्कि जब रामचंद्र जी शक्ति मां का पूजा कर रहे थे और आराधना में कमल चला रहे थे, तो आपके ही कहने पर माता ने एक कमल को छुपा लिया था। अतःपर जब राम जी ने पूजा संपूर्ण करके के लिए अपनी आंख को आपके चरणों में अर्पित करने वाले थे, तब आप ने संतुष्ट होकर उनको इच्छा अनुसार वर प्रदान किया।

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जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

मूलार्थ: हे कभी ना अंत होने वाले महादेव, सबकी कृपा करने वाले, सबकी घट में स्थान लेने वाले महाकाल आपकी जय हो। हे शंकर काम क्रोध मोह अहंकार लोभ मुझे परेशान करते हैं। मुझे ब्रह्म में डालकर बेचैन करते हैं। इन सब नकारात्मक चीजों से बाहर निकाल के मुझे अपनी भक्ति मोह में लेकर मुक्ति दिलाओ। अपने त्रिशूल से इन सब चीजों को खत्म करके मेरा समस्त संकट दूर करो।

मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

मूलार्थ: माता पिता भाई बहन संकट में कोई भी अपना साथ नहीं देता। मेरे स्वामी सिर्फ आप ही सहारा हो, संकटों से मुक्ति दो। निर्धन व्यक्ति को धन देने वाले प्रभु, भक्त जो भी फल चाहता है वह आपकी कृपा से प्राप्त करता है। हे प्राणनाथ आपकी आराधना की नियम हम क्या जाने, अगर हमसे कोई भूल हो जाए तो हमें माफ कर देना।

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥

मूलार्थ: शंकर समस्त संकटों का नाश करने वाले आप ही हो। भक्तों का मंगल और समस्त परेशानी का विनाश तुम ही करते हो। मुनि ऋषि और जोगी सब आपका ही ध्यान आराधना करते हैं। शरद नारद सब आपके सामने शीश झुकाते हैं।

नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥

मूलार्थ: हे शिवाय आपको प्रणाम। ब्रह्मा भी जिसका पार ना जान सके, हे शिव आपका जय हो। जो भी इस पाठ को मनसे करेगा शंभू जी उनका सहायता जरूर करेंगे।

ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥

मूलार्थ: कर्ज में डूब गए व्यक्ति भी अगर इसकी पाठ करेंगे, तो शंभू जी उनको समृद्ध करेंगे। अगर कोई संतान हीन व्यक्ति आपका आराधना करते हैं, तो आपके प्रसाद स्वरूप वह संतान प्राप्त करते हैं। अगर त्रयोदशी के दिन कोई पण्डित बुलाकर हवन करवाता है, व्रत रखते हैं, तो उसकी हर कष्टों का निवारण करते हैं महादेव।

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धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

मूलार्थ: धूप दीप जलाकर, नैवेद्य अर्पित करके अगर आपका कोई तपस्या करें तो उसकी जन्मों जन्मों के पाप शंकर जी आप दूर करते हैं, उनको अपने पास स्वर्ग में स्थान देते हैं। अयोध्या वासी आपका ही आशा में बैठे हैं, हे सब कुछ जानने वाले हमारी हर दुख को दूर करो शंकर महादेव।

॥दोहा॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

बोलो शिव शंभू महादेव की जय ||

शिव जी का आरती पाठ | Shiv Ji Ka Aarti Full Hindi Lyrics

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी ॐ जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव,अर्द्धांगी धारा॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुराननपञ्चानन राजे।

हंसासन गरूड़ासनवृषवाहन साजे॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुजदसभुज अति सोहे।

त्रिगुण रूप निरखतेत्रिभुवन जन मोहे॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमालामुण्डमाला धारी।

त्रिपुरारी कंसारीकर माला धारी॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बरबाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुणादिकभूतादिक संगे॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डलुचक्र त्रिशूलधारी।

सुखकारी दुखहारीजगपालन कारी॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिवजानत अविवेका।

मधु-कैटभ दो‌उ मारे,सुर भयहीन करे॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

लक्ष्मी व सावित्रीपार्वती संगा।

पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।

भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।

शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।

नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरतिजो कोइ नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥

ॐ जय शिव, ॐ जय शिव ओंकारा॥

शिव स्तुति पाठ | Shiva Stuti in Hindi PDF

शंकरं, शंप्रदं, सज्जनानंददं, शैल – कन्या – वरं, परमरम्यं ।

काम – मद – मोचनं, तामरस – लोचनं, वामदेवं भजे भावगम्यं ॥1॥

कंबु – कुंदेंदु – कर्पूर – गौरं शिवं, सुंदरं, सच्चिदानंदकंदं ।

सिद्ध – सनकादि – योगींद्र – वृंदारका, विष्णु – विधि – वन्द्य चरणारविंदं ॥2॥

ब्रह्म – कुल – वल्लभं, सुलभ मति दुर्लभं, विकट – वेषं, विभुं, वेदपारं ।

नौमि करुणाकरं, गरल – गंगाधरं, निर्मलं, निर्गुणं, निर्विकारं ॥3॥

लोकनाथं, शोक – शूल – निर्मूलिनं, शूलिनं मोह – तम – भूरि – भानुं ।

कालकालं, कलातीतमजरं, हरं, कठिन – कलिकाल – कानन – कृशानुं ॥4॥

तज्ञमज्ञान – पाथोधि – घटसंभवं, सर्वगं, सर्वसौभाग्यमूलं ।

प्रचुर – भव – भंजनं, प्रणत – जन – रंजनं, दास तुलसी शरण सानुकूलं ॥5॥

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शिव चालीसा क्या है – What is Shiv Chalisa in Hindi?

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